उड़ना चाहे मन बस तेरे ही संग
उड़ना चाहे मन बस तेरे ही संग,
क्यूं घेरे इसे पाब्ंधियां,
क्यूं जकडें इसे बेड़ियां पांव की,
जब उड़ना चाहे मन बस तेरे ही संग।
क्यूं जाना चाहे बावरा उन राहों पर जो बनीं हैं आलोचनाओं के लिए।
आखिर क्यूं उड़ना चाहे मन बस तेरे ही संग।
बन चली हुं आज पतंग सी, जिसकी डोर है केवल तुम्हारे हाथों में,
जाना चाहे नील गगन में
क्यूँकि तुम ही हो अब यादों में।
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