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बेबस

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वो चिडयाओं की चहचाहट आजकल शहरों में मिलती कहाँ हैं। मगर कबूतर जरूर घोंसले बना लेते हैं। हमारे घर में भी कुछ ऐसा हुआ। ऊपर मोमटी में बाहर की साइड कबूतरों ने अपना घर बना लिया। हालांकि उनके द्वारा नीचे फर्श पर फैलाई जाने वाली गंदगी से घर की साफ़ सफाई तो प्रभावित हुई मगर हमारी मंशा उनका घर उजाड़ने की न थी। क्योंकि घर उजाड़ने पर जो दर्द होता है वो शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। तो हमने उन्हें सहन किया।  कबूतरों की फड़फड़ाहट और बींट का सिलसिला यूंही चलता रहा। कबूतरों का परिवार लगातार बढ़ रहा था। पर एक दिन उनके इस खुशहाल परिवार पर काले कौवों की नजर पड़ गयी। हमने तो कौवों को हमेशा अपने बड़ों से राक्षश कहते ही सुना है। और उनकी हरकतों से वो लगते भी ऐसे ही हैं। किसी को अगर भगवान लगते हों तो मैं उनकी भावनाओं को ठेस नहीं पहुँचाना चाहता। बचपन में गांव में कौंवे घर से खाने के बर्तनों में से कटोरी चमच्च तक उठा कर ले जाते थे। पर अब जो उन्होंने किया था वो मेरे लिए उन कटोरी और चम्मचों से कहीं ज्यादा था। रविवार का दिन था। सुबह के करीब 8 बजे थे। हम बगीचे में बैठ अख़बार पढ़ ही रहे थे कि 2 से 3 कौ...