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एक ज़िंदगी ऐसी भी..

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                           ये कविता उन पर आधारित है जिन्हें खुद उनके माँ बाप बेच देते हैं। कुछ लोग नज़रे  घुमाते हैं.. कुछ लोग नज़रे मिलाते हैं.. क्यों दोनों की नज़रों में प्यार नहीं किसी ने बेचा किसी ने खरीदा हैं.. क्यों किसी को इस बात से एतराज़ नहीं.. मेरा मुस्कुराता चेहरा लोग घृना से देखते हैं.. क्यों मेरा अंदर से टूटना उन्हें दिखता नहीं.. मेरे अरमानों को छिना मेरें सपनों को तोड़ा.. क्यों वो लोग किसी सज़ा के हक़दार नहीं अपने जख्मों का हिसाब क्या दूँ.. अपने  दिल से निकले  इस सवाल  का जवाब  क्या दूँ.. लोग जीते हैं अपनी जिंदगी अपने तरीके से .. क्यों खुद पर  मेरा अपना अधिकार नहीं!!                        -अमृता :)

इक देश मेरा...

इक देश मेरा भूखा है। कहीं बाढ़ है तो कहीं सूखा है। काम के बोझ तले, कहीं मासूमियत का साथ छूटा है। मेरा 'स्वर्ग' भी मुझसे आज रूठा है। कहता है हर बच्चा वहाँ का , जा तेरा देश बड़ा ही झूठ...

इक आदत पुरानी...

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वो भी क्या दिन थे, जब भागे जा रहे थे कदम तेज़ रफ्तार से। समय भी कहता था, ज़रा रुक जा, मेरे साथ चल। कहीं खो गया तू, तो मैँ लेने न आऊँगा।। मेरे साथ चल; हमसफ़र बन, गर रुक गया तू, न ठहरूंगा तेर...

याद आते हैं पल...

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अक्सर याद आते हैं पल, बीत जाने के बाद। याद आता है बचपन, जवानी के बाद। समय में उलझें से हैं  सभी, लेकिन कभी-कभी सुलझ जाती हैं उलझनें, समय बीत जाने के बाद। आज है मारा मारी लक्ष्य को पा लेने की, लेकिन याद आती है यह ज़िन्दगी, बीत जाने के बाद।

जब कोई शहर जलता है

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जब कोई शहर जलता है ना, तो सिर्फ शहर ही नहीं जलता, उस शहर से जुड़े हर व्यक्ति का रोम-रोम जलता है। जल जाती है उनकी हँसती खेलती ज़िंदगी, जल जाता है उसका भविष्य उसके अरमान तबाह हो जाती ...

आग की परछाई देखी है कभी

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आग की परछाई देखी है कभी पानी की तरह होती है पानी की परछाई देखी है कभी रोशनी की तरह होती है और रोशनी की तो परछाई होती ही नहीं वो तो बस आपकी परछाई  बनाती है।