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जुलाई, 2016 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

इक देश मेरा...

इक देश मेरा भूखा है। कहीं बाढ़ है तो कहीं सूखा है। काम के बोझ तले, कहीं मासूमियत का साथ छूटा है। मेरा 'स्वर्ग' भी मुझसे आज रूठा है। कहता है हर बच्चा वहाँ का , जा तेरा देश बड़ा ही झूठ...

इक आदत पुरानी...

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वो भी क्या दिन थे, जब भागे जा रहे थे कदम तेज़ रफ्तार से। समय भी कहता था, ज़रा रुक जा, मेरे साथ चल। कहीं खो गया तू, तो मैँ लेने न आऊँगा।। मेरे साथ चल; हमसफ़र बन, गर रुक गया तू, न ठहरूंगा तेर...

याद आते हैं पल...

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अक्सर याद आते हैं पल, बीत जाने के बाद। याद आता है बचपन, जवानी के बाद। समय में उलझें से हैं  सभी, लेकिन कभी-कभी सुलझ जाती हैं उलझनें, समय बीत जाने के बाद। आज है मारा मारी लक्ष्य को पा लेने की, लेकिन याद आती है यह ज़िन्दगी, बीत जाने के बाद।