कैसी ये रीत है
ये कैसी अजीब सी रीत है आ गई, जो मेरे अपनों के मन में घरौंदा सा बना गई। मेरे आने की खुशी में जो चहक रहे थे, मेरे आते ही क्यों मायूसी सी छा गई। जो कर रहे थे मेरे आने का इंतजार, आज वही नजरें फेरते नज़र आ रहे हैं। बेटा नहीं ये तो बेटी है, क्यों अब सब मुझसे मुँह मोड़ रहे हैं ? मैं रो रही हूँ,अम्मा गोद में भी नहीं लेती, क्यों बापू को भी मेरी अवाज़ सुनाई नहीं देती? ये कैसा फैसला ले लिया मिलकर सबने, क्यों हवाले मौत के कर रहे, मुझे मेरे ही अपने। रूह काँप रही है मेरी,सीने से लगा लो माँ, मत जाने दो मुझे बापू,बचा लो ना। मौका तो दो, बेटे से बेहतर कर दिखाउंगी मैं...