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कैसी ये रीत है

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ये कैसी अजीब सी रीत है आ गई, जो मेरे अपनों के मन में घरौंदा सा बना गई। मेरे आने की खुशी में जो चहक रहे थे, मेरे आते ही क्यों मायूसी सी छा गई। जो कर रहे थे मेरे आने का इंतजार, आज वही नजरें फेरते नज़र आ रहे हैं। बेटा नहीं ये तो बेटी है, क्यों अब सब मुझसे मुँह मोड़ रहे हैं ? मैं रो रही हूँ,अम्मा गोद में भी नहीं लेती, क्यों बापू को भी मेरी अवाज़ सुनाई नहीं देती? ये कैसा फैसला ले लिया मिलकर सबने, क्यों हवाले मौत के कर रहे, मुझे मेरे ही अपने। रूह काँप रही है मेरी,सीने से लगा लो माँ, मत जाने दो मुझे बापू,बचा लो ना। मौका तो दो, बेटे से बेहतर कर दिखाउंगी मैं...                      

बेबस

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वो चिडयाओं की चहचाहट आजकल शहरों में मिलती कहाँ हैं। मगर कबूतर जरूर घोंसले बना लेते हैं। हमारे घर में भी कुछ ऐसा हुआ। ऊपर मोमटी में बाहर की साइड कबूतरों ने अपना घर बना लिया। हालांकि उनके द्वारा नीचे फर्श पर फैलाई जाने वाली गंदगी से घर की साफ़ सफाई तो प्रभावित हुई मगर हमारी मंशा उनका घर उजाड़ने की न थी। क्योंकि घर उजाड़ने पर जो दर्द होता है वो शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। तो हमने उन्हें सहन किया।  कबूतरों की फड़फड़ाहट और बींट का सिलसिला यूंही चलता रहा। कबूतरों का परिवार लगातार बढ़ रहा था। पर एक दिन उनके इस खुशहाल परिवार पर काले कौवों की नजर पड़ गयी। हमने तो कौवों को हमेशा अपने बड़ों से राक्षश कहते ही सुना है। और उनकी हरकतों से वो लगते भी ऐसे ही हैं। किसी को अगर भगवान लगते हों तो मैं उनकी भावनाओं को ठेस नहीं पहुँचाना चाहता। बचपन में गांव में कौंवे घर से खाने के बर्तनों में से कटोरी चमच्च तक उठा कर ले जाते थे। पर अब जो उन्होंने किया था वो मेरे लिए उन कटोरी और चम्मचों से कहीं ज्यादा था। रविवार का दिन था। सुबह के करीब 8 बजे थे। हम बगीचे में बैठ अख़बार पढ़ ही रहे थे कि 2 से 3 कौ...

पर अब परवाह नहीं ...

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अब वो धुन भी इतनी तनहा नहीं कर पाती ऐसा लगता है जैसे अब मैं भावहीन हो चला हूँ किसी भी घटना का अब दुःख सा नहीं होता , ऐसा लगता है जैसे कुछ घटा ही नहीं। क्या ये हमारे जीवन में कलयुग की दस्तक है क्या हम अब सिर्फ अपने लिए सोचने लगे हैं क्या अब हमारे पास खुद के लिए भी समय नहीं है क्या सचमुच हमने अपने विनाश की दुनिया रच ली है आखिर हम कैसा संसार बसाना चाहते हैं   जहाँ सिर्फ हमारा मतलब जुड़ा हो क्या मतलब के इस साम्राज्य से हमारा कुछ भला हो सकता है , सोचिये जरा क्या दुनिया में पैसे से बढ़कर कोई सुख नहीं रहा है क्या अब आत्मिक शांति की कोई जगह नहीं बची है हाँ मैं गलत लग सकता हूँ क्योकिं मैं अब इस सच को लिखने की हिम्मत रखता हूँ पर अब परवाह नहीं .............

एक ज़िंदगी ऐसी भी..

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                           ये कविता उन पर आधारित है जिन्हें खुद उनके माँ बाप बेच देते हैं। कुछ लोग नज़रे  घुमाते हैं.. कुछ लोग नज़रे मिलाते हैं.. क्यों दोनों की नज़रों में प्यार नहीं किसी ने बेचा किसी ने खरीदा हैं.. क्यों किसी को इस बात से एतराज़ नहीं.. मेरा मुस्कुराता चेहरा लोग घृना से देखते हैं.. क्यों मेरा अंदर से टूटना उन्हें दिखता नहीं.. मेरे अरमानों को छिना मेरें सपनों को तोड़ा.. क्यों वो लोग किसी सज़ा के हक़दार नहीं अपने जख्मों का हिसाब क्या दूँ.. अपने  दिल से निकले  इस सवाल  का जवाब  क्या दूँ.. लोग जीते हैं अपनी जिंदगी अपने तरीके से .. क्यों खुद पर  मेरा अपना अधिकार नहीं!!                        -अमृता :)

इक देश मेरा...

इक देश मेरा भूखा है। कहीं बाढ़ है तो कहीं सूखा है। काम के बोझ तले, कहीं मासूमियत का साथ छूटा है। मेरा 'स्वर्ग' भी मुझसे आज रूठा है। कहता है हर बच्चा वहाँ का , जा तेरा देश बड़ा ही झूठ...

इक आदत पुरानी...

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वो भी क्या दिन थे, जब भागे जा रहे थे कदम तेज़ रफ्तार से। समय भी कहता था, ज़रा रुक जा, मेरे साथ चल। कहीं खो गया तू, तो मैँ लेने न आऊँगा।। मेरे साथ चल; हमसफ़र बन, गर रुक गया तू, न ठहरूंगा तेर...

याद आते हैं पल...

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अक्सर याद आते हैं पल, बीत जाने के बाद। याद आता है बचपन, जवानी के बाद। समय में उलझें से हैं  सभी, लेकिन कभी-कभी सुलझ जाती हैं उलझनें, समय बीत जाने के बाद। आज है मारा मारी लक्ष्य को पा लेने की, लेकिन याद आती है यह ज़िन्दगी, बीत जाने के बाद।