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सितंबर, 2015 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

तमाशाबीन है यहाँ

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सड़क पर तमाशाबीन मोहोल्ले में तमाशाबीन ऑफिस में तमाशाबीन घर में तमाशाबीन लुटती रहे सड़क पर इज्जत देखते रहते हैं तमाशाबीन करता रहे कोई शहर को गंदा देखते रहते हैं तमाशाबीन ...

बस तेरा साथ हो

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बस तेरा साथ हो चाहे कोई भी बात हो साथ हम चल लेंगे मंजिल दूर हो या पास हो छोटे छोटे सुख- दुःख   मिलकर बाँटा करेंगे तुम अगर रूठ जाओ तो खुद को डाँटा करेंगे बस तू मेरे साथ हो चाहे कोई ना साथ हो साथ हम चल लेंगे   मंजिल दूर हो या पास हो...

मेट्रो की रफ़्तार से धक्के खाती जिंदगी

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मेरी ये कविता आज भी जिंदगी के सच को उडेल कर रख देती है, आशा है आप भी इसका आनंद लेंगे... मेट्रो की रफ़्तार से धक्के खाती जिंदगी कभी बसों में तो कभी ट्रैफिक में धक्के खाती जिंदगी कभी बिजली तो कभी पानी के लिए तरसती ये जिंदगी कभी डी एल तो कभी पासपोर्ट के लिए चक्कर काटती जिंदगी जीने की चाहत में चरखा बनती जिंदगी कभी बॉस तो कभी राजनेताओ के चँगुल में फसती जिंदगी कभी रफ़्तार तो कभी ज़िन्दगी से ही रास्ता भटक जाती ये जिंदगी किसी के लिए हल्की धूप तो किसी के लिए सर्दी की काली रात है ये जिंदगी किसी के लिए भ्रष्टाचार तो किसी के लिए शिष्टाचार ही है जिंदगी इस कलयुग में सिमटी सी जा रही ये जिंदगी महानगरो की धूल सी बनकर रह गयी ज़िंदगी  मेट्रो की रफ़्तार से धक्के खाती ये जिंदगी।

कुछ बाकी है तो बताना

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चेहरा तो वही है पहले वाला स्माइल भी वही है पहले वाली पर बातें अब नहीं पहले जैसी यादें अब नहीं पहले जैसी हाँ दोस्त नहीं अब पहले वाले रास्ते नहीं अब पहले वाले रास्ते बदल जाने से क्या इंसान भी बदल जाते हैं एक अच्छा खासा  इंसान पत्थर दिल कैसे बन जाता है अब कुछ बाकी हो तो बताना....