मेरी ये कविता आज भी जिंदगी के सच को उडेल कर रख देती है, आशा है आप भी इसका आनंद लेंगे... मेट्रो की रफ़्तार से धक्के खाती जिंदगी कभी बसों में तो कभी ट्रैफिक में धक्के खाती जिंदगी कभी बिजली तो कभी पानी के लिए तरसती ये जिंदगी कभी डी एल तो कभी पासपोर्ट के लिए चक्कर काटती जिंदगी जीने की चाहत में चरखा बनती जिंदगी कभी बॉस तो कभी राजनेताओ के चँगुल में फसती जिंदगी कभी रफ़्तार तो कभी ज़िन्दगी से ही रास्ता भटक जाती ये जिंदगी किसी के लिए हल्की धूप तो किसी के लिए सर्दी की काली रात है ये जिंदगी किसी के लिए भ्रष्टाचार तो किसी के लिए शिष्टाचार ही है जिंदगी इस कलयुग में सिमटी सी जा रही ये जिंदगी महानगरो की धूल सी बनकर रह गयी ज़िंदगी मेट्रो की रफ़्तार से धक्के खाती ये जिंदगी।