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एक ज़िंदगी ऐसी भी..

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                           ये कविता उन पर आधारित है जिन्हें खुद उनके माँ बाप बेच देते हैं। कुछ लोग नज़रे  घुमाते हैं.. कुछ लोग नज़रे मिलाते हैं.. क्यों दोनों की नज़रों में प्यार नहीं किसी ने बेचा किसी ने खरीदा हैं.. क्यों किसी को इस बात से एतराज़ नहीं.. मेरा मुस्कुराता चेहरा लोग घृना से देखते हैं.. क्यों मेरा अंदर से टूटना उन्हें दिखता नहीं.. मेरे अरमानों को छिना मेरें सपनों को तोड़ा.. क्यों वो लोग किसी सज़ा के हक़दार नहीं अपने जख्मों का हिसाब क्या दूँ.. अपने  दिल से निकले  इस सवाल  का जवाब  क्या दूँ.. लोग जीते हैं अपनी जिंदगी अपने तरीके से .. क्यों खुद पर  मेरा अपना अधिकार नहीं!!                        -अमृता :)