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नेता जी की झंडी है खाली

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नेता जी की झंडी है खाली ना जाने अब करेंगे किसकी सवारी बहुत सवारी करी नेता जी ने ना जाने अब किसकी बारी हर थाली का चखा स्वाद हर पार्टी का किया गुणगान जिधर देखा पलड़ा भारी उधर ही नेता जी की सवारी आज इनके तो कल उनके पर गद्दी नहीं जाने दी खाली नेता जी की झंडी है खाली देखते हैं अब किसकी बारी।

हमसफर

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छोड़ गए साथ हमसफर, जो किया करते थे वादा ज़िन्दगी भर का। ज़िन्दगी रह गई इक कोरे कागज़ सी, जिस पर केवल बूंदें ही रह गई स्याहि की। वक्त के खाली पन्नौं पर लिखकर अलविदा, समय दे गए लौट कर आ...

उड़ना चाहे मन बस तेरे ही संग

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उड़ना चाहे मन बस तेरे ही संग, क्यूं घेरे इसे पाब्ंधियां, क्यूं जकडें इसे बेड़ियां पांव की, जब उड़ना चाहे मन बस तेरे ही संग। क्यूं जाना चाहे बावरा उन राहों पर जो बनीं हैं आलोचनाओं के लिए। आखिर क्यूं उड़ना चाहे मन बस तेरे ही संग। बन चली हुं आज पतंग सी, जिसकी डोर है केवल तुम्हारे हाथों में,  जाना चाहे नील गगन में क्यूँकि तुम ही हो अब यादों में।

कुछ कमी है।।

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कमी है यहां उस खिलखिलाती हँसी की कमी है यहां खुशी के उन आसुंओं की। कुछ कमी है  सिकु़ड़ते लम्हों की कुछ कमी है बचपन की मासूमियत की। कमी है कुछ किस्से कहानियों की और कमी है उन गीतों के गुनगुनाने की। आज इन कोरे पन्नों को रंगने की एक इच्छा पर कमी है कुछ उन प्यारे खुशी भरे पलों की।