पर अब परवाह नहीं ...
किसी
भी घटना का अब दुःख सा नहीं होता,
ऐसा लगता है जैसे कुछ घटा ही नहीं।
क्या ये हमारे जीवन में कलयुग की
दस्तक है
क्या हम अब सिर्फ अपने लिए सोचने लगे हैं
क्या हम अब सिर्फ अपने लिए सोचने लगे हैं
क्या अब हमारे पास खुद के लिए भी
समय नहीं है
क्या सचमुच हमने अपने विनाश की दुनिया रच ली है
क्या सचमुच हमने अपने विनाश की दुनिया रच ली है
आखिर हम कैसा संसार बसाना चाहते
हैं
जहाँ सिर्फ हमारा मतलब जुड़ा हो
जहाँ सिर्फ हमारा मतलब जुड़ा हो
क्या दुनिया में पैसे से बढ़कर कोई
सुख नहीं रहा है
क्या अब आत्मिक शांति की कोई जगह नहीं बची है
क्या अब आत्मिक शांति की कोई जगह नहीं बची है
हाँ मैं गलत लग सकता हूँ
क्योकिं मैं अब इस सच को लिखने की
हिम्मत रखता हूँ
पर अब परवाह नहीं
.............


Ajay bhai ji
जवाब देंहटाएंKmaal likhte ho aap