जब कोई शहर जलता है
जब कोई शहर जलता है ना, तो सिर्फ शहर ही नहीं जलता, उस शहर से जुड़े हर व्यक्ति का रोम-रोम जलता है।
जल जाती है उनकी हँसती खेलती ज़िंदगी, जल जाता है उसका भविष्य उसके अरमान
तबाह हो जाती है उसकी वर्षों की पूंजी
उसके सपनों का शहर, जिस पर उसे गर्व था
सोचता था अब कोई मल्टीनेशनल कंपनी यहाँ लगेगी
पर अब कौन आकर झांकेगा यहाँ
कौन बनाएगा यहाँ फिर से वो उजड़ा बाजार
कहाँ गया वो हरियाणा, जिथे था दूध-दही का खाना
उजाड़ने में टाइम नहीं लगता, बनाने में लगता है
कौन रहना चाहेगा अब यहाँ दहसत के इस ख़ौफ़ में
कौन करेगा विश्वास तुम पर जातियों की इस खाई में
पार्टी और सत्ता तो बदलती रहेगी पर कौन वापस लाएगा फिर से वो भरोसा वो प्यार
सच सामने आने में देर नहीं लगेगी, ये हुआ नहीं है ये करवाया गया है
ये आग सिर्फ आरक्षण की आग नहीं, ये जातिये दंगे है।
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