इक आदत पुरानी...

वो भी क्या दिन थे,
जब भागे जा रहे थे कदम तेज़ रफ्तार से।
समय भी कहता था, ज़रा रुक जा, मेरे साथ चल।
कहीं खो गया तू, तो मैँ लेने न आऊँगा।।
मेरे साथ चल; हमसफ़र बन,
गर रुक गया तू, न ठहरूंगा तेरी राह में।
रोक लिए थे कदम हमने भी मुस्करा कर,
और कह दिया,
"तेरी बेवफ़ाई तो पुरानी है, आदत है तेरी मुझे रोक कर, मुझसे आगे निकल जाने की"।।

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